सोमवार 28 जुलाई 2014

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ऑवला एक दिव्य गुणकारी वनौषधि

ऑवला एक दिव्य गुणकारी वनौषधि

ऑवला एक अत्यंत महत्वपूर्ण औषधि है। कहा जाता है कि आंवला में गुण ही गुण है कोई अवगुण नहीं। इसका ताजा फल रसायन, वृष्य, रक्तपित को दूर करने वाला, शीतल मृदु विरेचक, मूत्रल एवं यकृत की क्रिया ठीक करने वाला है। रसायन के लिए एक विशिष्ट प्रकार की विधि से सेवन करने का विधान चरक संहिता में बताया गया है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार ताजे सूखे ऑवले के चूर्ण को लेकर उसको ताजे आंवले के रस की भावना देकर सुखाना चाहिए। यह जितनी अधिक बार दी जाएगी। उतना ही गुणकारक होगा। कम से कम 21 भावना देकर सुखाकर रखना चाहिए। इस चूर्ण की 3 से 6 माशा की मात्रा गोघृत तथा मधु (असमान मात्रा) के साथ दिन में दो बार लेनी चाहिए। इसी प्रकार च्यवनप्राश का भी उपयोग किया जा सकता है। इसके सेवन से शरीर की सभी क्रियाएं सुधारकर शरीर पुष्ट एवं बलवान बनता है। स्मृति, मेधा, कांति बढ़ती है। श्वास, कास, क्षय, पांडु, अग्निमांद्य, वीर्य दोष, आदि दूर होते हैं। आंवला एवं हल्दी का काथ बस्तिशोध एवं पित प्रकोपजन्य व्याधि में उपयोगी है। आंवले का रस मूत्रकृच्छ, रक्तपित, पिताशूल, कामला हिक्का, बमन, जीर्ण विबन्ध में मिश्री मिलाकर शर्बत के रुप में बहुत लाभदायक है। प्रशीतादि रोग में भी यह बहुत उपयोगी है। आंवले का चूर्ण अर्श, अतिसार, संग्रहणी, अत्यार्तव एवं प्रतिश्याय में उपयोगी है। पेड़ पर ही लगे आंवले को चीरने से जो रस निकलता है उससे आंख धोने से अक्षिशाय दूर होता है। उसी प्रकार इसके बीजों की मींगी के क्वाथ से आंख धोने से आंखों का दर्द दूर होता है। अक्षिप्रक्षालन के लिए रात भर जल में भिंगोये आंवले के चूर्ण का पानी भी उपयोगी है। लौह भस्म के साथ आंवले का उपयोग पाण्डु व कामला में विशेष लाभकर होता है।

आंवले के पत्तों का क्वाथ सूखे व्रण लाभदायी है। इसके कोमल पत्तों को छाछ के साथ देने से अजीर्ण और अतिसार में लाभ होता है। आंवले का बस्ति प्रदेश पर लेप मूत्रावरोध में एवं गर्भाशय मुख पर रक्त प्रदर में उपयोगी है। आंवले का विशेष उपयोग च्यवनप्राश, आमलकी रसायन, त्रिफला एवं धात्री लौह में किया गया है। मात्रा-चूर्ण 3 माशे से 1 तोला तक।
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